विक्रम संवत 2083 का प्रारंभ 19 मार्च 2026 को प्रातः 6:53 बजे होगा। मीन राशि चतुर्गुरु योग है। सूर्य, चंद्रमा, शुक्र और शनि मीन राशि में गोचर कर रहे हैं। इस गुरुवार को शुक्ल पक्ष के प्रथम चरण का स्वामी बृहस्पति है। योग इस प्रकार है - शुक्ल करण नागव किंस्तुघ्न, भाव (गृह), मास फाल्गुन (चन्द्र मास), चैत्र, ऋतु वसंत, अयन उत्तरायण, संवत्सर पराभव (गुजराती संवत 2082), शक संवत 1948, कलि संवत 5127, संवत्सर (उत्तर) रौद्री। ग्रहों की स्थिति इस प्रकार है: सूर्य और चंद्रमा उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में एक ही डिग्री पर हैं, और शनि उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के दूसरे चरण में है। शुक्र रेवती नक्षत्र के दूसरे चरण में है। राहु कुम्भ राशि में शतभिषा के तीसरे चरण में है। मंगल कुंभ राशि में शतभिषा नक्षत्र के चौथे चरण में है। बुध शतभिषा नक्षत्र में वक्री है।
विक्रम संवत 2083: पराभव से रौद्री संवत्सर तक, चतुर्गुरु योग का विशेष संयोग
विक्रम संवत 2083 का भव्य शुभारंभ 19 मार्च, 2026 को प्रातः 6:53 बजे होगा। यह नववर्ष का प्रवेश मीन राशि में एक अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली चतुर्गुरु योग के साथ हो रहा है, जो वर्ष भर के घटनाक्रमों की रूपरेखा तय करेगा। विक्रम संवत 1प्रारंभ तिथि और समय: 19 मार्च 2026, प्रातः 6:53 बजे।
मीन राशि में महासंयोग: नव संवत्सर के समय, सूर्य, चंद्रमा, शुक्र, और न्यायप्रिय शनि—ये चार महत्वपूर्ण ग्रह मीन राशि में गोचर कर रहे हैं।
संवत्सर नाम: इसका प्रारंभ पराभव संवत्सर (गुजराती संवत 2082 के अनुसार) में होगा, और उत्तरार्ध में यह रौद्री संवत्सर में प्रवेश करेगा।
अन्य महत्वपूर्ण कालगणना:
- शक संवत: 1948
- कलि संवत: 5127
- मास और ऋतु: फाल्गुन (चन्द्र मास), चैत्र, और वसंत ऋतु का प्रभाव रहेगा।
- अयन: उत्तरायण
सूर्य और चंद्रमा उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में एक ही डिग्री पर हैं, शुक्र रेवती नक्षत्र के दूसरे चरण में है।
शनि उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के दूसरे चरण में है
कुंभ में राहु शतभिषा नक्षत्र का तीसरा चरण मंगल कुंभ राशि में शतभिषा नक्षत्र में चौथे चरण में है। बुध शतभिषा नक्षत्र में वक्री गति है।
नव संवत्सर का शुभारम्भ शास्त्रों के अनुसार कब हुआ था: - ब्रह्मपुराण के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सूर्योदय के समय ही ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि की रचना की थी l
सत्ययुग का आरम्भ भी इसी दिन हुआ था
इसी महत्व को समझ कर भारतवर्ष के महामहिम सार्वभौम श्री सम्राट विक्रमादित्य जी ने भी अपने संवत्सर का शुभारम्भ आरम्भ आज के प्राय: इक्कीस सौ वर्ष पहले किया था l शास्त्रों ज्ञान रखते हुए चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन सूर्योदय के समय माना जाता था l चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से भगवती श्री दुर्गा मां आगमन होता हैं और नव रात्रि पूजा पाठ और अर्चना की जाती हैं
गुरुवार का विशेष संयोग:
यह गुरुवार का दिन है, जिसके शुक्ल पक्ष के प्रथम चरण का स्वामी बृहस्पति है, जो शुभता और ज्ञान का प्रतीक है।
करण और योग:

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