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Friday, May 3, 2024

नव वर्ष और विक्रम संवत 2081 पंचक नक्षत्र 2024-2025

   







प्राचीन भारतीय ज्योतिष विशेषता नक्षत्रों पर आधारित रहा है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त सभी क्रि भारतीय ज्योतिष विशेषता नक्षत्रों पर आधारित रहा है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त सभी क्रियाकलापों में उनकी शुभ शुद्ध एवं मुहूर्त का ज्ञान नक्षत्रों द्वारा ही किया जाता रहा है। फलित ज्योतिष में बहुत महत्व दिया गया है उसी आधार पर इनका वर्गीकरण किया गया है। उन आधार पर पंचक संज्ञक नक्षत्र भी हैं। यह नक्षत्र है धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती नक्षत्र हैं। जिस समय किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है सबसे पहले इन नक्षत्रों पर विचार किया जाता है। इन नक्षत्रों में कोई भी शुभकृत्य निषेध माना गया है। जैसे दक्षिण दिशा में यात्रा करना,  झोपड़ी, मकान, दुकान में छत डालना, चारपाई, पलँग, आदि बनाना, बांस या ईंटओ की दीवार बनाना , तांबा, लोहा, पीतल, लकड़ी आदि इकठ्ठा करना, गृहारम्भ रख कर छत डालना, मुर्दा जलाना आदि का कार्य करना अशुभ माना जाता हैं।


       जिस समय चन्द्रमा कुम्भ और मीन राशि मे गोचर करता है। 
.    चन्द्र पंचक नक्षत्र 

 इस   नक्षत्र की प्रवृत्ति होती है कि यदि कोई दुर्घटना इस समय होती हैं तो उस घटना की पांच बार से पुनरावृत्ति होती हैं और शुभ मुहूर्त में चयन करते समय त्याग दिया जाता है। यदि किसी परिवार में पंचक के समय कोई मृत्यु होती हैं तो एक साल के अंतराल में उस परिवार में पांच मृत्यु होती हैं। मृत व्यक्ति का दाह संस्कार करते समय मृत शरीर के साथ कुशा घास के पांच पुतलो का भी दाह संस्कार किया जाता है।    इस पंचक नक्षत्र में नए मकान निर्माण करना अच्छा नही होता हैं।दाह संस्कार और दक्षिण की ओर यात्रा करना शुभ नही होता हैं।

 मृत्यु के बाद  इस पंचक नक्षत्र की शान्ति करवाना अवश्य करनी चाहिए।

नव वर्ष और विक्रम संवत 2081 पंचक नक्षत्र   

                  पंचक नक्षत्रो विक्रम संवत पंचक नक्षत्रों का प्रारंभ और समापन काल 2024- 2025
  1.  अप्रैल       5-4-2024             7:12.       9-4-2024.             7:32 

  2. मई            2-5-2024.           14:32.      6-5-2024.            17:43

  3.  मई           29 -5 -2024.        20:06.      3-6-2024.            1:40

  4. जून            26-6-2024           1:49.        30-6-2024.          7:34

  5. जुलाई         23-7-2024            9:20.       27-7-2024.          12:59

  6. अगस्त         19-8-2024.         18:59.     23-8-2024.          19:54

  7. सितम्बर      16-9-2024.          05:44.    20-9-2024.          5:15. 

  8. अक्टूबर       13-10-2024.       15:44.    17-10-2024.       16:20

  9. नवंबर          09-11-2024.         23:27.    14-9-2024.         03:11

  10. दिसंबर         07-12-2024.         05:06.     11-12-2024.      11:47

  11. जनवरी         03-01-2025.         10:47.      07-01-2025.     17:50

  12. जनवरी         30-01-2025          18:45.      03-02-2025.    23:16

  13. फ़रवरी          27-02-2025.          04:37.      03-03-2025.    06:39

  14. मार्च             26-3-2025.           15:14  

Thursday, June 23, 2022

30 सितंबर से 25 नवम्बर 2022 शुक्र अस्त अवस्था कन्या राशि में गोचर करेंगे

           30 सितंबर 2022 को भारतीय मानक समय 6 बजकर 19 मिनट पर शुक्र ग्रह उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र चतुर्थ चरण में  कन्या राशि स्थित हैं ।कन्या राशि मे शुक्र अपनी नीच राशि में स्थित है। सूर्य-बुध के साथ युति में होगे।विक्रमी संवत 2079,आश्विन मास शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि, दिन शुक्रवार को शुक्र कन्या राशि में स्थित अस्त होने जा रहे हैं।कन्या राशि में सूर्य और बुध वक्री अवस्था में स्थित है।

         


शुक्र 30 सितंबर से 25 नवम्बर 2022  कुल 57 दिनों अस्त अवस्था में रहेंगे।कन्या, तुला और वृश्चिक में गोचर करेंगे |   सूर्य-शुक्र-वक्री बुध की दृष्टि शनि के ऊपर है,सूर्य- बृहस्पति का समसप्तक योग का निर्माण कर रहे हैं।देश विशेष में युद्ध का भयंकर वातावरण बनेगा।सीमा क्षेत्रों में अशांति रहेगी।रक्तपात,कुछ प्रान्तो में बाढ़ ग्रस्त होगे।बंगाल, बिहार, झारखंड और पूर्वी मध्यप्रदेश,गुजरात, पश्चिमी पंजाब, मुल्तान, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान आदि ।भूकंप, आगजनी, उग्रवादी घटनाओं, महामारी ,आकाशीय बिजली गिरने की सम्भावना हैं।मुस्लिम देशों में सत्ता परिवर्तन का योग बन रहे है।पाकिस्तान, रूस,चीन कोरिया की देशों में शस्त्र निर्माण के कार्य अघोषित युद्ध का संकेत मिल रहा है जिसके कारण विश्व में अशांति फैलने की सम्भावना हैं।प्राकृतिक प्रकोप से हालात खराब होंगे।देश की मुद्रा स्थिति कमजोर होने से जनता महंगाई से परेशान रहेगी।


खगोल शास्त्र के अनुसार पृथ्वी अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमकर एक चक्र 24 घण्टे में पूरा करती हैं।सूर्य और सभी ग्रहों को पूर्व से पश्चिम की ओर चलता हुआ दिखाई देता है।इस कारण आकाशीय पिंड प्रतिदिन पूर्व में उदय होकर पश्चिम में अस्त हो जाते है।कोई भी ग्रह जब भ्रमण करते हुए जब सूर्य के निकट आ जाता हैं।सूर्य के प्रकाश में ढक जाता है, उस समय में वो आकाश में दिखाई नही देता है और उस समय ग्रह का अस्त होना कहते है।वैसे तो बुध और शुक्र हमेशा जब पृथ्वी के समीप आते हैं और तब वो मार्गी नहीं रहते हैं, वो वक्री हो जाते है।शुक्र भोगांश में सूर्य के भोगांश से कम हो,उस समय यह सूर्योदय से पहले पूर्व में दिखाई देते है।कुछ दिनों गति करते हुए हैं, सूर्य के समीप आ जाते है और उस समय समय ग्रह अस्त हो जाता हैं।या एक राशि में युति होने से निकट आ जाते है।अस्त हो जाते है।इस समय सूर्य और शुक्र कन्या राशि में युति कर रहे हैं।

           राजा और राक्षसों के गुरु शुक्र की युति होने का रही हैं।शुक्र कारक है, पत्नी,विवाह, सैक्स सम्बंधित मामलों का कारक,प्रजनन अंग,ऐ न्द्रीय सुख,संगीत, काव्य,सुगंध,ऐश्वर्या की सभी वस्तुओं,प्रेम संबंध, जीवन शक्ति , आकर्षक, नृत्य, वाहनों,इत्र,वीर्य,मांसपेशियों, मूत्राशय,केमिकल दवाओं,कलाओं,सजावट, समारोहों, वैभव, कामेच्छाओं, पत्नी,पति का कारक है।जिस समय दहन अवस्था में होते है शुभ कार्य बाधित  हो जाते है। जन्म चंद्रमा से शुक्र का गोचर पहले,दूसरे, तीसरे,चौथे,पंचम,आठवें,नवम, ग्यारहवीं, और बारहवीं घरों शुभ फल प्राप्त होते है।शेष घरों में शुभ फल प्राप्त नही होते है।गोचर में व्यक्ति को दुश्मनों से समस्याओं का सामना करते हैं।साझेदारी में रुकावट पैदा होती हैं।


   पत्नी के साथ मनमुटाव, यात्रा में वाहन से दुर्घटना,दूसरी स्त्रियों के साथ नाजाज सम्बंध,पेशाब की समस्या, किडनी में समस्या,कई तरह समस्याओं का सामना करना पड़ता है।यह तभी संभव है कि शुक्र की दशा,अन्तर दशा चल रही हो।यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग अलग प्रभाव पड़ता है।जब तक शुक्र ग्रह अस्त होते है कि शादी,विवाह, सामाजिक समारोह, सगाई,अनुष्ठान,मुण्डन, यज्ञोपवीत धारण, यज्ञ,मांगलिक कार्य, नाजायज सम्बंध नही बनाने चाहिए।जेवरात खरीद करना शुभ कार्य नहीं करने चाहिए।

Sunday, January 16, 2022

भद्रा किसे कहते हैं

 ज्योतिषशास्त्र के महत्वपूर्ण पांच अंग होते है। 1.तिथि 2.वार 3.नक्षत्र 4.योग 5.करण यह सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं।

भद्रा किसे कहते हैं :- तिथि के अर्ध भाग को ही भद्रा कहते हैं। भद्रा काल में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता हैं जैसे विवाह, मुंडन संस्कार , गृहारम्भ, यज्ञोपवीत,रक्षाबंधन,नवीन व्यवसाय शुभ कार्यो का प्रारम्भ करना वर्जित माना जाता है। भद्रा काल में तंत्र, मंत्र,शत्रु का उच्चाटन करना,यज्ञ करना,शस्त्र का प्रयोग करना, ऑपरेशन, मुकदमा दर्ज करना, भैंस, ऊंट,घोड़ा ,पशु सम्बन्धी कार्य करने प्रशस्त माने जाते हैं।एक पक्ष में लगभग चार बार भद्रा काल की आवृत्ति होती हैं।शुक्ल पक्ष की अष्टमी और पूर्णिमा तिथि के पूर्वार्द्ध में तथा चतुर्थी एवं एकादशी तिथि के उत्तरार्द्ध में भद्रा काल होता है।  जबकि कृष्णपक्ष की ३ से १० वीं तिथि के उत्तरार्द्ध में तथा सप्तमी एवं १४ तिथि के पूर्वार्द्ध में भद्रा की व्याप्ति रहती हैं।


                                 

भद्रा कौन है :- भगवान सूर्य की पत्नी छाया से उत्पन्न पुत्री हैं।शनि देव की छोटी बहन हैं।शनिदेव की क्रूर ,विघ्न बाधा उत्पन्न करने वाली होती हैं।डरावनी,अशुभ प्रभाव,तंत्र विद्या में सिद्धि दे वाली है।शास्त्रों के अनुसार दिन की भद्रा रात्रि को और रात्रि की भद्रा दिन में भी व्याप्त हो जाए,तो वो भद्रा दोष रहित हो जाती हैं। भद्रा तीन प्रकार की होती हैं।स्वर्ग वाली ऊर्ध्वमुखी कहतेहै ।चन्द्र राशि मेष,वृषभ,मिथुन और वृश्चिक राशि का चन्द्रमा होने पर भद्रा स्वर्गलोक में, कन्या,तुला,धनु एवं मकर का चन्द्रमा होने से भद्रा पाताल लोक होती हैं।कर्क,सिंह,कुंभ व मीन राशि का चन्द्रमा होने पर भद्रा मृत्यु लोक में यानि भू-लोक सम्मुख में रहती हैं।

        भद्रा के नाम और नाम सदृश फल प्राप्त होता हैं। भाद्र के नाम 1 हंसी  2 नंदिनी 3त्रिशिरा  4 सुमूखी  5 करालिका 6 विकृति  7रौद्रमुखी  8 चतुर्मुखी जैसे शुक्ल पक्ष की अष्टमी पूर्वार्ध की भद्रा का नाम हंसी पूर्णिमा के पूर्वार्ध की भद्रा का नाम नंदिनी इत्यादि क्रम से भद्रा के नाम समझने चाहिए। चतुर्थी आदि तिथियों में भद्रा का मुख और पुच्छ किन किन प्रहरो में होता हैं।जैसे शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पांचवीं प्रहर के आदि की ५ घटी में भद्रा का मुख होता हैं। इसी प्रकार अष्टमी के दूसरे प्रहर में, एकादशी के सातवें प्रहर में, पूर्णमासी के चतुर्थ प्रहर और कृष्ण पक्ष की तृतीया के आठवें प्रहर, सप्तमी के तीसरे प्रहर में, दशमी के छठे प्रहर और चतुर्दशी के प्रथम प्रहर की आदि की ५ घाटियों में भद्रा का मुख होता हैं,जो शुभ  कार्यों में अशुभ होता हैं।

राशियों के अनुसार भद्रा का निवास

  लोक वास

स्वर्ग वास

पाताल लोक

भूमि लोक 

चन्द्र राशि

1,2,3 & 8

6,7,9,10

4,5,11,12

भद्रा मुख 

ऊधर्वमुखी 


अधोमुखी

सम्मुख

Monday, July 5, 2021

19 फरवरी 2022 से 20 मार्च 2022 तक बृहस्पति कुम्भ राशि दहन अवस्था होने वाले हैं।


 

19 फरवरी, 2022 को 12 घंटे 15 मिनट भारतीय मानक समय पर  गुरु की सूर्य युति कुम्भ राशि में होने जा रही है।  बृहस्पति राहु नक्षत्र शतभिषा में स्थित है।  बृहस्पति और सूर्य कुम्भ राशि की युति में हैं। बृहस्पति और सूर्य दोनों ग्रहों के बीच 11° का अंतर है


 बृहस्पति की दहन स्थिति होने वाली हो, तो इस अवधि के दौरान सभी शुभ अवसरों को स्थगित कर देना चाहिए।  जब बृहस्पति वृद्धावस्था में होता है, दहन अवस्था में होता है।  उदाहरण के लिए विवाह, विद्यालय में  संतान का प्रवेश, नया मकान निर्माण, कुआं खोदना, तालाब, बाग, व्रत का आरंभ और अंत, व्रत का उद्घापन ,नवविवाहित पत्नी में गृह प्रवेश, यज्ञ, योगियों का संस्कार, नव-विकसित अनाज खाना, ज्योतिष सीखना,  भगवान का समारोह, नए पद की शपथग्रहण, अंगूठी समारोह,सगाई , नया वाहन खरीद, शादी के लिए नए कपड़े, आभूषण, मुंडन समारोह, मन्दिर में मूर्ति प्राणप्रतिष्ठा करना, गोदभराई की रस्म,विवाह के लड़का या लड़की देखना, कोई भी मंगलकार्य करना, नए मकान की नींव रखना, नये घर प्रथम बार प्रवेश करना वर्जित मानेजाते है।जिस दिन से बृहस्पति दहन अवस्थामें जाने वाले हो तो उससे तीन पहले और तीन बाद में कोई शुभ कार्य नही करना चाहिए।

Friday, July 2, 2021

शुक्र ग्रह 4 से 14जनवरी 2022 धनु राशि मे गोचर अस्त होने जा रहे हैं।



 4 से 14 जनवरी   2022 को शुक्र ग्रह अस्त होगा। भारतीय मानक समय 08 घण्टे 32 मिनट ,शुक्र ग्रह धनु राशि मे स्थित हैं। शुक्र इस दौरान सूर्य के  नक्षत्र उत्तराषाढ़ा में स्थित है।धनु राशि में अस्त होने जा रहे है।शुक्लपक्ष की त्रयोदशी तिथि, दिवस 

 सौरमंडल में ग्रह परिक्रमा करते-करते जब सूर्य के बहुत नजदीक हो जाते हैं तो वे ग्रह अस्त हो जाते हैं। उनका अपना प्रभाव नहीं रह जाता है।इस लिये उनको अस्त कहा जाता है।जब भी पृथ्वी के समीप आते है ।सूर्य के निकटतम आ जाते हैं और उनके 8° से कम अन्तर आ जाता हैं उस समय अस्त हो जाते है। शुक्र पश्चिम दिशा में अस्त होने जा रहे हैं।शुक्र सातवें भाव के कारक होते है,विवाह के सम्बन्ध रखते है।


सूर्य के साथ शुक्र युति में है। राहु -सूर्य -शुक्र 6/8 की स्थिति में है। शुक्र जलीय तत्व , आग्नेय दिशा के स्वामी हैं।शुक्र काम -सुख,वीर्य, विवाह सुख, ,व्यभिचार, शयन गृह, वशीकरण, आकर्षण, मैथुन, इससे मूत्राशय, शुगर एवं मैथुन, वीर्य सम्बन्धित रोगों का विचार किया जाता हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ,जिस समय शुक्र ग्रह अस्त हो,उस समय में यज्ञ,हवन, यज्ञोपवीत संस्कार,  मन्दिरों का निर्माण कार्य, विवाह, मकान का नीव आदि कार्यो को प्रारम्भ नही करना चाहिए। सभी प्रकार के शुभ कार्य वर्जित माने जाते है।