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Wednesday, January 31, 2024

13 अप्रैल 2024 (विक्रमी संवत 2081) की वर्षेश कुण्डली

              13 अप्रैल 2024, जगत लग्न कुंडली, भारतीय स्टैंड समय, 21:04 पर सूर्य मेष राशि में गोचर करेगा। कुंडली में वृश्चिक लग्न बनता है। वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल चतुर्थ भाव में शनि के साथ युति करेगा। मंगल युद्ध का सूचक है.|सृष्टि चक्र को चलाने वाले ईश्वर ही हैं और बाकी सब कुछ आकाश में ग्रह-नक्षत्रों का ही योगदान है जब सूर्य अपनी राशि से निकल कर दूसरी राशि में जाता है तो हम सभी के जीवन में परिवर्तन आना स्वाभाविक है। हमारा भाग्य रेखा में तय होता है और सूर्य शक्ति और शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। मेष राशि में बारह महीने आते हैं और यहीं से नए साल की शुरुआत होती है। मेष प्रथम पुरुष राशि है तथा सूर्य से पंचम भाव, सप्तम भाव तथा नवम भाव पर दृष्टि डालते हैं। इसमें अश्विनी नक्षत्र के चारों चरण, भरणी नक्षत्र के चारों चरण और कृतिका नक्षत्र का पहला चरण शामिल है। अश्विनी नक्षत्र का स्वामी केतु ग्रह है जो ध्वज का प्रतीक माना जाता है, जो प्रथम और आगे बढ़ने वाला तथा रचनात्मक स्वभाव के साथ रचनात्मक शक्ति को दर्शाता है। मंगल मेष राशि का स्वामी है और बल, शक्ति और ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है और सूर्य अश्विनी नक्षत्र में अपने उच्चतम स्थान पर है। सूर्य और अश्विनी नक्षत्र का संबंध स्वतंत्रता और से भी है|

                                          


                                                              

         नए साल की शुरुआत में सूर्य मेष राशि में गोचर करेगा। वृश्चिक लग्न की कुंडली बन रही है और लग्न का स्वामी मंगल चतुर्थ स्थान में शनि के साथ युति करेगा। शनिदेव कर्म का फल देने वाले हैं और मंगल युद्धक्षेत्र का संकेत दे रहे हैं। उत्तर एवं दक्षिण दिशा अधिक प्रभावित होगी। भारतीय सीमा को समुद्री और आंतरिक शक्तियों या पड़ोसी देशों से कोई खतरा नहीं होगा। हमारे पड़ोसी देश जैसे चीन, पाकिस्तान, ताइवान, उत्तर प्रदेश, भारत आदि विश्व शांति से वंचित हैं। विश्व की स्थिति भयानक युद्ध के समान है। राजनीतिक दलों में भूकंप, तूफ़ान और अस्थिरता का पता लगाया जा सकता है। उग्रवाद, रक्तपात प्राकृतिक आपदा आ रही है। क्या अंतरिक्ष में अचानक बदलाव लाया जा सकता है?

    विश्व की कुंडली इस समय संकेत दे रही है कि चतुर्थ भाव में मंगल और शनि की युति के कारण प्राकृतिक आपदाएं, भूकंप, बर्फबारी, तूफान, तूफान और बाढ़ आएंगी और कृषि क्षेत्र पर भारी प्रभाव पड़ेगा और उद्योग। आकाश की स्थिति : संसार में भयंकर युद्ध होने वाला है। रूस और यूक्रेन में नाटो सेना के शामिल होने से कई देशों के शामिल होने से भयावह स्थिति पैदा हो जाएगी. विश्व युद्ध होगा. कट्टर विस्तारवादी देशों के रूप में चीन और पाकिस्तान दोनों का व्यवहार भारत और अन्य विकासशील देशों के लिए समस्याएँ पैदा करेगा। भारत और दूसरे देशों में नफरत और भेदभाव भड़काने वाले काम करेंगे. मैं भगवान शिव से हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई धर्म के बीच भाईचारा बनाए रखने की प्रार्थना करता हूं। आने वाले समय में आप बाहरी और आंतरिक विपरीत परिस्थितियों पर काबू पाने का प्रयास करेंगे और अच्छे कर्म और अच्छे कार्य करके अपनी सोच में बदलाव लाएंगे। यह नया साल बड़ी मुश्किल का समय है और बाहरी दुनिया में मुस्लिम देशों के बीच एकता दिखाई दे रही है और इसके युद्ध क्षेत्र बनने की प्रबल संभावना है। प्राकृतिक आपदाओं से देश प्रभावित होंगे। चीन और अमेरिका में बुध की दृष्टि कमजोर होने लगी है। शीतयुद्ध की प्रबल सम्भावना है। सूर्य, शुक्र और राहु के एक साथ आने से कठिन परिस्थितियाँ पैदा होंगी और राजनीतिक दलों और देशों के लिए समस्याएँ पैदा होंगी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भारत में गोचर देश के कई हिस्सों में बदलाव लाएगा। आगे हरि की इच्छा है.

​The horoscope of the world is currently indicating that due to the conjunction of Mars and Saturn in the fourth house, there will be natural calamities, earthquakes, snowfall, storms, storms, floods and there will be a huge impact in the agriculture sector and industry. Situation of the sky: There is going to be a massive war in the world. Due to NATO military involvement in Russia and Ukraine, a terrible situation will be created with the involvement of many countries. There will be a world war. The behavior of both China and Pakistan as staunch expansionist countries will create problems for India and other developing countries. They will do things that incite hatred and discrimination in India and other countries. I pray to Lord Shiva to maintain brotherhood among Hindus, Muslims, Sikhs and Christianity. In the coming time, you will try to overcome external and internal adverse situations and will change your thinking by doing good deeds and good work. This New Year is a time of great difficulty and there is a visible unity among Muslim countries in the outside world and there is a strong possibility of it becoming a war zone. Countries will be affected by natural disasters. The vision of Mercury has started weakening in China and America. There is a strong possibility of a cold war. The coming together of Sun, Venus and Rahu will create difficult situations and will create problems for political parties and countries. In astrology, transit in India will bring changes in many parts of the country. Next is Hari's wish.

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Tuesday, March 28, 2023

22 जून 2023 को विक्रमी संवत 2080 सूर्य देव आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश कुण्डली

 आर्द्रा छठा नक्षत्र है जिसका विस्तार 66°40' से होता है। आर्द्रा का अर्थ है नम। जब सूर्य आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करता है तो आर्द्रा प्रवेश चार्ट मौसम की भविष्यवाणी के लिए तैयार किया जाता है। इसकी उपयोगिता देश में विशेष रूप से मानसून के दौरान वर्षा और मौसम की स्थिति का पूर्वानुमान लगाने और वर्ष के दौरान फसलों को प्रभावित करने में है। कोई भी कृषि उत्पादों और उनकी कीमतों पर प्रभाव का अनुमान लगा सकता है।

                                            


22 जून 2023 को भारतीय समयानुसार 17:47 बजे सूर्य मिथुन राशि में, आर्द्रा नक्षत्र में स्थित है। उस दिन गुरुवार को आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की चतुर्थी हर्ष योग में चंद्रमा अश्लेषा नक्षत्र कर्क और वृश्चिक लग्न में प्रवेश करेगा। राशी मालिक है। यह एक जल राशि है और सूर्य उत्तर दिशा के स्वामी आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश कर चुका है।

लग्न की कुंडली वृश्चिक है। लग्न का स्वामी मंगल कर्क राशि में चंद्र-शुक्र के साथ युति कर रहा है। शनि कुम्भ राशि में स्थित है और उस पर राहु और गुरु की दृष्टि है। शनि-मंगल ग्रह षडाष्टक योग बना रहे हैं। कुछ स्थानों पर भीषण भूकंप, भयंकर बाढ़ और बिजली गिरने की आशंका है। बिहार, ओडिशा, मेघालय, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे कई राज्यों में प्राकृतिक आपदाएं आने वाली हैं। शनि का प्रभाव उत्तर दिशा में रहेगा।


               गोचर ग्रहों की स्थिति के अनुसार भारत और विदेशों के कुछ प्रांतों में भारी बारिश के कारण भारी तूफान, भूकंप या बाढ़ की स्थिति हो सकती है। शनि अपनी कुम्भ राशि में रहेगा। उत्तरी गोलार्ध में जल-जमाव, प्राकृतिक प्रकोप, तूफान, हिंसा भूकंप पृथ्वी को काफी हद तक हिला देंगे। साम्प्रदायिक दंगे और राजनीतिक दलों द्वारा हत्याएं और अन्य कई प्रकार की उथल-पुथल होगी, जिससे जनता को बहुत नुकसान उठाना पड़ेगा। आकाशीय बिजली, समुद्री क्षेत्रों में तूफान, जलप्रलय, महामारी की संभावना से जनजीवन प्रभावित होगा। यह संभव है। युद्ध की स्थिति भी बन सकती है।

      आर्द्रा नक्षत्र का अर्थ है नमी जो गर्मी के बाद ठंडी होती है, नमी के कारण बादलों के मौसम के समय, सूर्य भगवान जून के तीसरे सप्ताह में आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करते हैं। गीला पैठ भी कहा जाता है। वर्षा ऋतु आती है। चारों ओर समृद्धि है और खेतों में हरियाली बहुतायत में दिखाई देती है। बारिश की हल्की फुहार मन में उत्साह और उल्लास जगाती है। रुद्र देव यानी संहारक शिव को आर्द्रा नक्षत्र का स्वामी माना जाता है। लाल रंग के राक्षसों का विनाश। यह भी दिखाया गया है। यह अप्रिय, हानिकारक, प्रलय, मतिभ्रम, अराजकता को समाप्त करने का कार्य भी करता है।

जन्म के समय जब सूर्य चन्द्रमा से तीसरे, छठे, दसवें और ग्यारहवें भाव में गोचर करता है तो यह शुभ फल देता है, यदि उस समय शनि के अलावा कोई अन्य ग्रह क्रमश: नौवें, बारहवें, चौथे और पांचवें भाव में गोचर करता है। हैं। किया जा। सूर्य एक महीने के लिए एक विशेष घर में रहता है। सूर्य शरीर में एक ऊर्जा तंत्र के रूप में निवास करता है। यह भावनाओं, स्वास्थ्य और शक्ति को प्रभावित करता है। यह व्यक्ति के किसी भी लिंग के अधिकारों को प्रभावित करता है। जन्म कुंडली या गोचर में सूर्य का प्रभाव अक्सर स्वास्थ्य से पीड़ित और सत्ता में अधिकारियों के साथ समस्याओं का संकेत देता है। वर्ष के दौरान जब सूर्य जन्म स्थान के विपरीत होता है, तो यह शायद ही कभी भाग्यशाली होता है, यह जीवन शक्ति को कम करता है और संकेत के अनुसार शीतलता और कमजोरी का कारण बनता है। लकड़ी, अग्नि, सत्य, वैद्य, वैद्य, अभिमानी, समर, शिव मंदिर, ईर्ष्यालु दंडाधिकारी, गुरु, वैद्य और वीरता, मन की पवित्रता। सूर्य स्वास्थ्य, पिता, शक्ति, अधिकार, नाम और प्रसिद्धि का कारक है। , सरकार, रॉयल्टी, दवा, आंखें, लकड़ी, ऊन, या इमारती लकड़ी, पूजा का स्थान, दलाली या कमीशन, रक्त परिसंचरण, मामा, सेवा, पेशा, साहस, पितृसत्ता, सम्मानजनक स्थिति, राजनेता, डॉक्टर, मरहम लगाने वाला, आत्मा, वन , मिठाई आदि। सूर्य मेष राशि में उच्च का और तुला राशि में नीच का होता है। सूर्य पुरुष राशि, पूर्व दिशा, अग्नि तत्व है।

   

Sunday, November 21, 2021

14 अप्रैल 2022 (विक्रमी संवत 2079) की वर्षेश कुण्डली

       14 अप्रैल 2022 को 08:39 मिन्ट विक्रमी संवत 2079 पर  में,चैत्र मास वृद्धि योग दिन बृहस्पति को सूर्य मेष राशि में प्रवेश करेंगे।सूर्य अश्विनी नक्षत्र में स्थित हैं।सूर्य -राहु-बुध के साथ युति करेंगे और केतु की दृष्टि होगी।जोकि कुछ प्रान्तों में भयंकर तूफान, अग्निकांड, प्राकृतिक प्रकोप, महामारी रोग से प्रभावित रहेगी।मंगल की दृष्टि सूर्य- बुध-राहु ऊपर है। लग्न के स्वामी शुक्र -मंगल के दशम भाव मे स्थित हैं।कुण्डली दशम स्थान से देखा जा सकता है।

                        



भारत,अफगानिस्तान, तुर्की,ईरान,ईराक , रूस,अमेरिका, चीन,पाकिस्तान,बांग्लादेश,पश्चिमी बंगाल, पंजाब आदि प्राकृतिक आपदा, विदेशों में गृह युद्ध, राज्यों में राजनीतिक दलों की तरह दंगे,उपद्रव,उथल पुथल, सत्ता में बदलाव, आंदोलन,उग्रवादी घटनाओं का समावेश होता दिखाई देगा। वार्षिक कुंडली सभी ग्रह राहु और केतु के मध्य में स्थित हैं।काल सर्प योग की कुंडली का निर्माण हो रहा है।चतुर्थ भाव के स्वामी सूर्य,पंचम भाव के स्वामी बुध के साथ राहु है शनि की दृष्टि बृहस्पति के ऊपर है।राजनेता को परेशानी ,गुप्त शत्रु, षड्यंत्र, आंतरिक गृह युद्ध योग बन रहे हैं।

बृहस्पति का मीन राशि में गोचर करेंगे और मीन राशि चीन देश की राशि हैं।बृहस्पति के ऊपर शनि की विशेष दृष्टि रहेगी ।चीन की विस्तार नीतियों के विश्व मे कई प्रकार विचित्र और अघटित घटनाएं घटती होगी।कई तरह उलट फेर होता दिखाई देगा।ग्रह स्थिति के अनुसार उथल-पुथल के संकेत बनते योग बन रहे हैं।जैसे प्राकृतिक आपदाओं, खड़ी फसलों पानी की कमी खराब होना, अचानक से बीमारी फैलना, जिसके कारण बच्चों, युवाओं को ग्रसित, अग्निकांड, भूकंप, भूखलन, सम्प्रदायिक उपद्रव आदि घटनाओं घटित होगी।उसने प्रभावित होने वाले राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार,असम और मुस्लिम देशों प्रभावित भी होने के संकेत मिल रहे है।17 मई 2022 को बृहस्पति,शुक्र और मंगल युति में होंगे।
29 अप्रैल 2022 को शनिदेव कुम्भ राशि में प्रवेश करेंगे और मंगल ग्रह के साथ युति में रहेंगे।17 मई 2022 तक युति में रहेंगे। जिसके कारण चीन,पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर में रक्तपात और हत्याकांड, मरने -मारने जैसी घटनाओं घटित होगी।
12 जुलाई 2022 से जनवरी 2023 तक  को शनि वक्री गति से मकर राशि गोचर करेंगे।जिस के कारण वायुवेग, अचानक गंभीर बीमारियों के लोग ग्रसित होंगे।भंयकर तूफान, भूकंप, वातावरण में परिवर्तन ,जलवायु परिवर्तन ,अधिक वर्षा होगी।
उसके बाद शनि कुम्भ राशि में गोचर करेंगे।



सत्ता से गिरने/महत्वपूर्ण व्यक्ति की मृत्यु के कारण शासन में वीआईपी परिवर्तन। दुनिया के पूर्वी हिस्से में युद्ध आदि का डर। और उत्तर-पश्चिमी देशों में परेशानी शनि की दशम दृष्टि से तुला राशि पर होगी चीन,पाकिस्तान,कुछ कट्टरपंथी देशों की दोगली नीति अपनाते हुए नजर आएंगे कई प्रकार की विषम परिस्थितियों ,और चुनौतियों का सामना करनाहोगा।कुछ देशों में आपसी संबंधों में टकराव,गृहयुद्ध,विस्फोटक घटनाओं का से परेशानी होगी। आपसी तालमेल की कमी होने से कुछ देशों सत्ता परिवर्तन होगा। 29 अप्रैल 2022 को शनि देवकुम्भ राशि मे प्रवेश करेंगे।उनकी तीसरी दृष्टि मेष राशि पर होगी।चीन का दोगलापन उसके ऊपर भारी पड़ेगा,जिससे दूसरे देशों अलग पड़ता दिखाई देगा।मुस्लिम देशों में उग्रवाद बढ़ता दिखाई देगा। विश्वमें  धार्मिकऔर जातिवाद को बढ़ता नजर आएगाऔरटकराव ,आतंकवाद से जनता परेशान रहेगी।

Tuesday, August 6, 2019

छः गण्डमूल नक्षत्र

गण्डमूल नक्षत्र छः प्रकार के होते हैं। 1. ज्येष्ठा, 2. मूला 3. आश्लेषा  4. मघा 5.रेवती  6. अश्विनी

  1. अश्विनी नक्षत्र :-

 सभी नक्षत्रों के चार चरण होते है। घोड़े का सिर अश्विनी प्रतीक चिन्ह है। घोड़े को सवारी के लिए इस्तेमाल करते हैं। घोड़ा हमेशा सवारी के लिए तैयार रहता हैं। केतु ग्रह इसके स्वामी हैं जातक जिंदा दिल ,समझदार होते हैं। जो सोचता उसको जल्दी से कार्यरूप देता हैं जिसके कारण नुकसान भी उठता हैं। छोटा कद , पुष्ट देह,सरल ह्रदय,क्रीड़ा प्रेमी होता हैं। किसी कार्य के अदुभुत क्षमता रखा है। यह जातक सारी उम्र कूदता रहता हैं। जिसके हानि भी हो जाती है। इस नक्षत्र वाले जातक सजने -सँवरने में अधिक विश्वास रखते हैं।यह वैश्य जाति का प्रतिनिधि माना जाता हैं।


                                   


           अश्विनी नक्षत्र के प्रथम चरण में बालक /बालिका का जन्म हो। पिता को कष्ट एवं धन हानि आदि अशुभ परिणाम होते हैं। अश्विनी नक्षत्र के दूसरे चरण जन्म लेने वाला धन का अपव्यय करता है। तृतीय चरण मे जन्म लेने वाला जातक पिता के आकस्मिक यात्रा  देता है। चतुर्थ चरण जन्म लेने जातक स्वयं अपने शरीर के लिए अरिष्टकारी कारक होता हैं।
          प्रथम नक्षत्र अश्विनी वैश्य जाति का प्रतिनिधित्व करता है।वाणिज्य करने सभी गुण अश्विनी नक्षत्र वाले जातकों में होते है। इस नक्षत्र के जातकों पुरूष संज्ञक माना जाता हैं। अश्विनी नक्षत्र मंगल की राशि मे सूर्य उच्च स्थान पाता हैं। अश्विनी नक्षत्र का अंग घुटना हैं।घुटने की चोट लगने से घोड़े की तीव्र गति से दौड़ते है उनका घुटने अधिक बली होते है। वात,पित्त,कफ में अश्विनी नक्षत्र वायु का प्रतिनिधितव करता हैं। अश्विनी का स्थान केंद्र होता हैं।
अश्विनी के चार पद :- 
  1. अश्विनी का प्रथम पद मेष राशि के शून्य अंश से 3 अंश 20 कला तक होने के कारण मेष राशि का प्रथम नवाशं बनता हैं।इस पद के स्वामी मंगल हैं जो जातक को साहस ,उत्साह व बल प्रदान कर अपने क्षेत्र अग्रणी बनता हैं। ऐसे जातक कर्मठ,ऊर्जावान तथा नेतृत्व करने सक्षम होते है।गण्डमूल संज्ञक होने के पिता के लिए कष्ट कारक होता हैं।
   2. द्वितीय पद :-  मेष राशि मे 3 अंश 20 कला से 6 अंश 40 कला तक है। इसका स्वामी शुक्र ग्रह हैं। इस चरण जन्मे बच्चे साधन संपन्न , भोग विलास के प्रेमी तथा धन वैभव युक्त सम्मानित आदमी होता हैं।परन्तु धन का अपव्यय करता हैं।
 
                       
       

         2.       आश्लेषा नक्षत्र :-

 आश्लेषा नक्षत्र संबंध सर्प की कुंडली , सबको समेटने वाला, सुंदर व आकर्षक व्यक्तित्व से माना जाता है। कुछ विद्वानों का मत है कि भगवान विष्णु की शेष शैया  वाले नागराज से भी जोड़ते हैं। सर्प हमेशा छुप कर वार करता हैं। जातक में यह गुण विद्यमान होते है। आश्लेषा नक्षत्र पर शुभ प्रभाव हो तो  जातक बुद्धिमान, व्यवहार कुशल, भविष्य दृष्टा और प्रतिभाशाली एवं अंतर्प्रज्ञा युक्त होता हैं। यदि पाप प्रभाव से दृष्टि हो तो जातक स्वार्थी, कपटी, धोखेबाज एवं छिप कर प्रहार करने वाला होता हैं। पिछले जन्म के अधूरे कार्य को पूरा करने के लिए जन्म लेता है। वंश परम्परा के अनुरूप कार्य करता हैं।

                             


                     

      मस्तिष्क की कार्य प्रणाली पर शोध करने वाले चिकित्सकों ने अश्लेषा नक्षत्र  जातको को क्रूर ,परिशोधी व थोड़ा हिंसक माना जाता हैं। कफ प्रकृति, जल तत्व की कर्क राशि रहता हैं। आश्लेषा नक्षत्र में उल्टे क्रम से परिणाम देखना चाहिए। इस नक्षत्र का चतुर्थ पाद में बालक का जन्म हो तो पिता की मृत्यु हो। तृतीय पाद में जन्म हो तो माता की मृत्यु होती हैं। दूसरे पाद जन्म हो तो स्वयं का धन का नाश करता हैं। प्रथम पाद में जन्म हो तो अशुभ प्रभाव नही होता हैं।

                                                       
                                                           

            3.  मघा नक्षत्र एक गण्डमूल नक्षत्र हैं।

 इसकी आकृति घास काटने वाली दराँती के नीचे के दस्ते  यानि मुठ पर मघा नक्षत्र का मुख्य तारा मघा स्थित हैं। इसके स्वामी केतु ग्रह हैं।यह नक्षत्र सिंह राशि मे होने से नक्षत्र का राशिपति सूर्य माना जाता है। दराँती का उपयोग फ़सक काटने के लिए करते हैं। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाला जातक पिछले जन्म के कर्मो के पुण्य कर्मों की फ़सल इस जन्म में काटने पर विवश होता हैं।शुभ कर्म उसे स्वास्थ्य,सम्मान व सत्ता का सुख मिलता हैं। मघा नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक आत्मज्ञान व आत्मसाक्षात्कार में मघा के नक्षत्रपति केतु एवं राशिपति सूर्य की विशेष भूमिका होती हैं। इस नक्षत्र को पितृ  या पूर्वजो को मघा नक्षत्र का अधिष्ठाता देवता भी माना जाता है। जातको को कुछ बीमारियां वंशानुगत होती है। जिस प्रकार भागीरथी नदी को लाने के लिए तीन पीढ़ियों के काम सामान्य बात है। मघा नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातकों आगामी जन्म लेने का  पूर्वभास होता हैं।

                             

                           

            मघा नक्षत्र एक सक्रिय नक्षत्र हैं क्योंकि अग्नि तत्व की राशि सिंह राशि मे जन्म लेता है।सूर्य ग्रह राशि के स्वामी हैं इसलिए जातक में ऊर्जा, स्फूर्ति से परिपूर्ण होता हैं। वैसे शुद्र नक्षत्र है।स्त्री संज्ञक नक्षत्र हैं।कफ प्रधान ,पूर्व,दक्षिण,उत्तर दक्षिण-पश्चिम दिशा माना जाता हैं।

         मघा नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म लेने वाला जातक माता के लिए अनिष्टकारी, दूसरे चरण में जन्म लेने वाला जातक पिता के लिए अनिष्टकारी होता हैं। तृतीय चरण में जन्म लेने वाला जातक धन संपदा एव सवारी का सुख प्राप्त करता हैं। चतुर्थ चरण वाला समस्त सुख सुविधाओं से परिपूर्ण होता हैं।

         

     4. ज्येष्ठा नक्षत्र सबसे बड़ा नक्षत्र हैं

। इस नक्षत्र के स्वामी बुध ग्रह हैं। इस नक्षत्र की गणना दिव्य शक्ति के रूप में कई जाती हैं। ज्येष्ठा नक्षत्र का जातक ,पिछले कर्मो के शुभ प्रभाव से धन -वैभव व सफलता पाता हैं। वैसे राक्षस गण की उपमा दी जाती हैं। यदि यह नक्षत्र पाप से पीड़ित हो तो  जातक अभिमान वंश धर्म विरुद्ध आचरण कर बैठते है। शुभ प्रभाव होतो जातक देवीय कृपा से पद ,प्रतिष्ठा, धन और यश प्राप्त करता हैं।ज्येष्ठानक्षत्र वायु प्रधान नक्षत्र हैं। ज्येष्ठा नक्षत्र जातक यदि वायु सम्बन्धित रोग, पेट गैस तथा गठिया सरीखे रोगों से कष्ट पाते हैं।

                             


ज्येष्ठा नक्षत्र का  प्रथम चरण में उत्पन्न जीव बड़े भाई  को अरिष्टकर होता हैं। दूसरे चरण में उत्पन्न बालक /बालिका छोटे भाई के लिए अरिष्टकारी होता हैं।ज्येष्ठा नक्षत्र तीसरे चरण में उत्पन्न माता के   अरिष्टकर होता हैं तथा ज्येष्ठा नक्षत्र के चतुर्थ चरण उत्पन्न बालक स्वयं के लिए शुभ नही होता हैं।

    5.    मूल नक्षत्र


 भचक्र के तीसरे तिहाई भाग का प्रथम नक्षत्र हैं।मूल नक्षत्र को महत्व प्रदान करने के लिए ही सभी तिहाई भाग के प्रथम व नवम नक्षत्र मूल संज्ञक माना जाता हैं। इस नक्षत्र का तापमान 30 हजार सेलशियस आंका गया हैं।इस नक्षत्र के स्वामी केतु ग्रह हैं। मूल का अर्थ है पौधे की जड़ ,यानि केन्द्र बिंदु हैं।यह नक्षत्र अपने नाम द्वारा जाना जाता हैं। जड़ सैदव भीतर रहती हैं,अपनी गुप्त मनोभाव ,अव्यक्त इच्छाओ , गुप्त रहस्यपूर्ण है मूल नक्षत्र हैं।

                       
         

             मूल नक्षत्र को स्वयं बृहस्पति जी ने आशीर्वाद दिया है।क्योंकि गुरु की मूलत्रिकोण राशि धनु ,जो काल  पुरूष का भाग्य स्थान हैं उसी शुभ  राशि मे मूल नक्षत्र विद्यमान हैं।  मूल नक्षत्र भारी उथल पुथल के बाद सत्य,समानता ,न्याय व अहिंसा की जड़ो को जमाता हैं। मूल नक्षत्र में वशिष्ट  गुण किसी भी बात तह तक पहुँचना ,समस्या का समाधान करने की शक्ति रखता हैं। कुछविद्वानों का मत हैं कि मूल नक्षत्र एक पुरूष नक्षत्र हैं,भगवानविष्णु जी के दोनों चरण के रूप में स्वीकृति दी है। मूल नक्षत्र वाले जातक घमंडी ,सबसे श्रेष्ठ मानने वाला, हठी,साहसी कार्य करने वाला होता हैं। अपने स्वामी केतु का असर भी दिखाई देता हैं।जातक बहुधा हिंसा, तोड़ फोड़ में भी रुचि रखता हैं।
                                             

मूल नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म लेने वाला जातक अपने पिता के  आरिष्टकार होता हैं। मूल नक्षत्र के दूसरे चरण में जन्म लेने वाला जातक अपनी माता के लिए अच्छा नही होता हैं।  तीसरे चरण में जन्म लेने वाला। जातक स्वयं के अच्छा नही होता हैं। मूल नक्षत्र के चौथे चरण में जन्म लेने वाला जातक  अनिष्ट प्रद माना जाता हैं। मूल नक्षत्र की शांति व पूजन करवाने से सुख व समृद्धि प्राप्त करता हैं।

1 पाद: - इस पाद में जन्म लेने वाले बच्चे पिता के लिए अशुभ होते हैं।
 द्वितीय पाद: - इस पाद में जन्म लेने वाले बच्चे माता के लिए अशुभ होते हैं।

 तृतीय पाद: - इस पाद में जन्म लेने वाले बच्चों को आर्थिक हानि का सामना करना पड़ेगा।
 चौथा पाड़ा: - इस पाद में जन्म लेने वाले बच्चे परिवार और रिश्तेदारों के लिए शुभ होते हैं।


       6     रेवती नक्षत्र :-

  काल पुरूष की कुंडली का बारहवाँ स्थान या मीन राशि ,जिसके स्वामी बृहस्पति ग्रह हैं। रेवती नक्षत्र भी गण्डमूल नक्षत्र का अंतिम नक्षत्र हैं।बुध ग्रह इसके स्वामी हैं।रेवती का अर्थ है धनी- मानी  एवं प्रतिष्ठित । भचक्र के अन्तिम नक्षत्र के नाम का अर्थ मोक्ष, आनन्द या सभी अभावो का नाश होना चाहिए था। इस नक्षत्र में मां के लक्ष्मी के सभी रूप आते हैं। यह एक शुभ परिवर्तन लाने वाला नक्षत्र भी है।विष्णु एवं बृहस्पति का पूर्ण आशीर्वाद होता हैं। राशि की छवि दो मछलियां जो एक दूसरे की पुंछ पकड़े हुए हैं यानि मोक्ष की इच्छा करता हैं। वो मीन राशि का प्रतिक हैं। रेवती नक्षत्र का संबंध आत्म ज्ञान एवं मोक्ष से भी हैं। रेवती नक्षत्र की आकृति एक ढोल यानि मृदंग जैसी है।अन्दर से खोखला यानि दोषो से मुक्ति और प्रभु की ओर ले जाने वाले है। भगवान विष्णु एवं बुध दोनों ही विद्या ,बुद्धि व चातुर्य के प्रतीक हैं। ऐसा जातक आस्थावान  और विपरीत परिस्थितियों में भी मानसिक संतुलन व धैर्य न खोने वाले होते हैं। दूसरे को अपनी बातों में उलझाने वाला होता है। अपने से प्रभावित करने की क्षमता होती हैं।



                                                           

         रेवाती नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म लेने वाला जातक राजा के समान, ऐशवर्यवान, होता हैं। दूसरे पाद में जन्म लेने वाला जातक सुख साधनों से सम्पन्न होता हैं। तीसरे चरण में जन्म लेने वाले जातक को धनी और अधिकार संपन्न होता हैं। चौथे चरण में जन्म लेने वाले जातक की अन्तिम दो घड़ियां गंडांत के अनिष्टकारी होती हैं।

Friday, January 2, 2015

विक्रमी संम्वत्

                  विक्रमी संम्वत् :- इसका काल का शुभारम्भ ईसा से 57 वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ल पक्ष        प्रतिपदा तिथि से माना जाता है । पंचांग में इसी प्रणाली का प्रयोग किया जाता है और यह चन्द्र मास पर    आधारित है तथा इस में सौरमासो का भी समावेश रहता है । चन्द्र वर्ष का आरम्भ चैत्र शुक्ल पक्ष     प्रतिप्रदा तिथि से किया जाता है ।